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युवराज सिंह पर 2011 में अगर धोनी न दिखाते भरोसा

उनके जैसे क्रिकेटर अब पैदा नहीं होते. ऐसे खिलाड़ी जो मैदान पर एंटरटेन करें और ये भी याद रखें कि इसके परे भी उनकी एक ज़िंदगी है.
अब युवराज सिंह जैसे खिलाड़ी नहीं होते जो बल्ले के उम्दा प्रहार और कैंसर को मात देकर अनगिनत दिलों को जीत लें.
उनके जैसे ज़िंदादिल लोग अब नहीं होते जो तमाम ख़ूबियों से लैस और अनमोल हों. भरोसेमंद हों और जादूगरी दिखा सकते हों.
उनमें कैच पकड़कर मैच जिताने की ख़ूबी थी. मुझे आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफ़ी का कोलंबो में हुआ वो मैच याद आता है जहां उन्होंने दक्षिण अफ्ऱीका के ख़िलाफ़ तीन शिकार किए थे.
प्रभावी लेफ़्ट आर्म स्पिन गेंदबाज़ी उनके क्रिकेट को समृद्ध करती थी. ये तमाम ख़ूबियां उन्हें एक ऐसी टीम का सबसे क़ीमती खिलाड़ी बना देती थीं जिसमें कई बड़े नाम थे.
उन दिनों जब वो सीमित ओवरों के खेल में शीर्ष पर दिखते थे, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और महेंद्र सिंह धोनी जैसे उनके कप्तान इन्हीं ख़ूबियों पर निसार थे.
धोनी के साथ उनके तल्ख़ रिश्तों के क़िस्से सामने आए हैं.
ये याद रखा जाना चाहिए कि इसकी शुरुआत ख़ुद उनके पिता योगराज सिंह की ओर से उस वक़्त हुई जब युवराज सिंह को साल 2015 के आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप के लिए नहीं चुना गया.
हालांकि बाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ ने ट्विटर पर प्रतिक्रिया दी और ख़ुद को ऐसे बयानों से दूर कर लिया और उन्होंने ये भी साफ़ किया कि उन्हें धोनी की कप्तानी में खेलने से कोई दिक्क़त नहीं है.
जानकारी के लिए ये बता दें कि उन्होंने जो 40 टेस्ट मैच खेले, उनमें से 16 टेस्ट मैचों में धोनी ने कप्तानी की थी.
उन्हें ये भी याद होगा कि एक से ज़्यादा मौक़े पर धोनी ने आगे आकर चयनकर्ताओं से कहा कि वो युवराज सिंह का समर्थन करें.
नवंबर 2008 में चयनकर्ताओं के पास इंग्लैंड के ख़िलाफ़ वन डे सिरीज़ की टीम से युवराज सिंह को बाहर रखने की वजहें थीं.
उस साल श्रीलंका में खेली छह पारियों में उन्होंने 72 रन ही बनाए थे. चयन समिति के पूर्व चेयरमैन दिलीप वेंगसरकर ने जब ये कहा कि युवराज सिंह में फोकस की कमी है तो यक़ीनन वो हौसला नहीं बढ़ा रहे थे.
कोच गैरी कर्स्टन की राय थी कि नाकामी का डर युवराज सिंह की बल्लेबाज़ी पर असर डाल रहा है.
एक ऐसे वक़्त में जब वन डे फॉर्मेट में भारत के प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ों के पूल ने सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गजों से बागडोर अपने हाथ में ले ली थी और वो सचिन तेंदुलकर की ग़ैरमौजूदगी को भी खलने नहीं दे रहे थे, तब चयनकर्ताओं के पास पीछे छूट गए खिलाड़ियों को गंभीरता से मुड़कर देखने की कोई वजह नहीं थी.
भारतीय क्रिकेट और युवराज सिंह की ख़ुशक़िस्मती थी कि कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने चयनकर्ताओं के चेयरमैन कृष्णमाचारी श्रीकांत और उनके साथियों को इस बात के लिए मनाया कि वो बाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ पर ज़्यादा सख़्ती न दिखाएं.
कप्तान की बात मानकर उनके (चयनकर्ताओं के) पास ख़ुश होने की वजह थी. युवराज सिंह ने किसी भी भारतीय की ओर से दूसरा सबसे तेज़ शतक जमाया. राजकोट में खेली गई उस पारी में युवराज ने दर्द के दरिया को भी पार किया.
युवराज सिंह ने अपनी प्रतिभा पर दिखाए गए भरोसे को सही ठहराने में कोई वक़्त नहीं गंवाया. तो क्या हुआ कि इस दौरान उनकी मांसपेशी में खिंचाव आ गया और उन्हें पैर में पट्टा बांधना पड़ा?
उनकी बल्लेबाज़ी देखना इस क़दर दिलचस्प था कि विरोधी कप्तान केविन पीटरसन ने उस जादुई पारी की तालियां बजाकर सराहना की. सिरीज़ के पहले मैच में खेली गई उस पारी का असर कहीं आगे तक रहा.
साल 2011 में दोबारा ऐसा ही हुआ. तब युवराज सिंह की फॉर्म और वर्ल्ड कप टीम में उनकी जगह को लेकर सवाल उठ रहे थे. साल 2010 में उनका बल्ले से प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं रहा. उन्होंने 15 मैचों में महज़ दो अर्धशतक जमाए.
कप्तान ने याद किया कि वर्ल्ड कप के पहले होने वाली कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल अलग हुआ करते थे.
वर्ल्ड कप में जब इस ऑल राउंडर ने लगातार तीसरा अर्धशतक जमाया उसके बाद धोनी ने कहा, "मुझे हमेशा भरोसा था कि वो (युवराज सिंह) बड़े मैच के खिलाड़ी हैं और बड़े टूर्नामेंट और अहम द्विपक्षीय सिरीज़ में अच्छा प्रदर्शन करते हैं. उन्हें रन बनाते, रन लेते और फील्डिंग में भी अतिरिक्त प्रयास करते देखना अच्छा लग रहा है. मैं उनके लिए बहुत ख़ुश हूं."
दिल्ली में नीदरलैंड्स के ख़िलाफ़ लीग मैच के पहले धोनी ने युवराज सिंह के बारे में कहा, "युवराज सिंह चार नंबर पर जिस अंदाज़ में बल्लेबाज़ी करते हैं, मैं उसका ज़बरदस्त फैन हूं. वो ज़रूरत के मुताबिक़ बल्लेबाज़ी का अंदाज़ बदल सकते हैं. उनकी गेंदबाज़ी एक बड़ी पूंजी है, ख़ासकर ये देखते हुए कि हम चार गेंदबाज़ों के साथ खेलते हैं और वो पांचवें गेंदबाज़ का काम करते हैं."
कैंसर को मात देकर जब वो क्रिकेट खेलने लौटे तब ये साफ़ था कि युवराज सिंह पहले जैसे बल्लेबाज़ नहीं रहे हैं. साल 2015 के पहले उन्होंने जो 19 मैच खेले, उनमें वो प्रति पारी 18.53 की औसत से 278 रन ही बना सके. इनमें सिर्फ़ दो अर्धशतक शामिल थे.
उनके लिए वर्ल्ड कप की उस टीम में जगह बनाना मुश्किल था, जहां कोहली, अजिंक्य रहाणे और सुरेश रैना मध्यक्रम में मज़बूती से डटे थे.
उन्होंने वापसी की. साल 2017 में 11 वनडे मैच खेले. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ कटक में 150 रन की सर्वश्रेष्ठ पारी खेली. इसके दम पर उस साल इंग्लैंड में खेली गई आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफ़ी की टीम में उन्हें जगह मिली.
उनका अहम हथियार मानी जाने वाली टाइमिंग आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफ़ी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ फ़ाइनल मुक़ाबले में उनके हाथ से छिटक गई.
लीग राउंड में उन्होंने इसी टीम के ख़िलाफ़ तूफ़ानी अर्धशतक जमाया था. उनका स्ट्राइक रेट 165.62 का था.
लेकिन फ़ाइनल में वो 31 गेंदों में 22 रन ही बना सके. वो सम्मानजनक विदाई का मौक़ा गंवा बैठे.

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